अमेरिका–वेनेजुएला संघर्ष : अमेरिका और वेनेजुएला के बीच चल रहा संघर्ष केवल दो देशों के आपसी मतभेद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विश्व राजनीति, संसाधनों पर नियंत्रण और वैचारिक टकराव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह संघर्ष दशकों से आकार लेता रहा है, लेकिन 21वीं सदी में यह और अधिक तीव्र हो गया। इसके केंद्र में हैं—तेल, सत्ता, समाजवादी विचारधारा और अमेरिका की वैश्विक रणनीति।

  अमेरिका–वेनेजुएला संघर्ष

 

अमेरिका–वेनेजुएला संघर्ष : वेनेजुएला तेल का खजाना

वेनेजुएला दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहाँ कच्चे तेल का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है। तेल वहाँ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और सरकारी आय का मुख्य स्रोत भी। लंबे समय तक अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियाँ वेनेजुएला के तेल उद्योग में सक्रिय रहीं। इससे अमेरिका को सस्ते तेल की आपूर्ति मिलती रही और वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी पर निर्भर बनी रही।

 

अमेरिका–वेनेजुएला संघर्ष : ह्यूगो चावेज़ और बदलाव की शुरुआत

1999 में ह्यूगो चावेज़ के राष्ट्रपति बनने के बाद हालात बदलने लगे। चावेज़ ने समाजवादी नीतियाँ अपनाईं और तेल उद्योग पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया। उनका उद्देश्य था कि तेल से होने वाली कमाई का इस्तेमाल गरीबों, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक योजनाओं में किया जाए।

यह नीति अमेरिका को पसंद नहीं आई, क्योंकि इससे अमेरिकी कंपनियों के हित प्रभावित हुए। यहीं से अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्तों में तनाव बढ़ना शुरू हुआ।

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अमेरिका–वेनेजुएला संघर्ष : अमेरिका की प्रतिक्रिया और राजनीतिक टकराव

अमेरिका ने चावेज़ सरकार पर लोकतंत्र को कमजोर करने, प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाने और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए। दूसरी ओर, वेनेजुएला का आरोप था कि अमेरिका उसकी संप्रभुता में दखल दे रहा है और सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर रहा है।

2002 में चावेज़ के खिलाफ असफल तख्तापलट की घटना ने इन आरोपों को और हवा दी, जिसमें अमेरिका की भूमिका को लेकर आज भी सवाल उठते हैं।

 

मादुरो का दौर और आर्थिक संकट

2013 में चावेज़ की मृत्यु के बाद निकोलस मादुरो सत्ता में आए। इस समय तक वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर हो चुकी थी। तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट और आंतरिक आर्थिक कुप्रबंधन ने हालात और बिगाड़ दिए।

अमेरिका ने मादुरो सरकार पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों का सबसे ज्यादा असर आम जनता पर पड़ा। देश में महंगाई बढ़ गई, दवाइयों और खाद्य पदार्थों की कमी हो गई, और लाखों लोग बेहतर जीवन की तलाश में देश छोड़ने को मजबूर हो गए।

 

अमेरिका–वेनेजुएला संघर्ष : 2019 का राजनीतिक संकट

2019 में संकट तब और गहरा हो गया, जब अमेरिका ने विपक्षी नेता जुआन गुएदो को वेनेजुएला का अंतरिम राष्ट्रपति मान्यता दे दी। कई पश्चिमी देशों ने भी उसका समर्थन किया। वहीं रूस, चीन और क्यूबा जैसे देशों ने मादुरो सरकार का साथ दिया।

इससे वेनेजुएला एक तरह से वैश्विक शक्ति संघर्ष का मैदान बन गया, जहाँ एक ओर अमेरिका और उसके सहयोगी थे, तो दूसरी ओर रूस और चीन जैसे देश।

 

तेल बनाम लोकतंत्र: असली सवाल

अमेरिका का कहना है कि वह वेनेजुएला में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा करना चाहता है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि अमेरिका की असली दिलचस्पी वेनेजुएला के तेल संसाधनों में है। इतिहास गवाह है कि जहाँ-जहाँ संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं, वहाँ अमेरिकी हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे हैं।

इस संघर्ष में यह तय करना कठिन हो जाता है कि नैतिकता कहाँ खत्म होती है और रणनीतिक स्वार्थ कहाँ से शुरू होते हैं।

 

आम जनता की पीड़ा

इस पूरे संघर्ष में सबसे ज्यादा नुकसान वेनेजुएला की आम जनता का हुआ है। राजनीतिक खींचतान, आर्थिक प्रतिबंध और आंतरिक समस्याओं ने आम लोगों का जीवन कठिन बना दिया है। बेरोज़गारी, पलायन और सामाजिक अस्थिरता देश की बड़ी चुनौतियाँ बन चुकी हैं।

निष्कर्ष :

अमेरिका–वेनेजुएला संघर्ष हमें यह सिखाता है कि जब वैश्विक राजनीति में संसाधन, विचारधारा और सत्ता एक-दूसरे से टकराते हैं, तो सबसे ज्यादा कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। इस संघर्ष का समाधान केवल बातचीत, आपसी सम्मान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है।

जब तक वैश्विक शक्तियाँ अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर नहीं सोचेंगी, तब तक वेनेजुएला जैसे देश अस्थिरता और संकट से जूझते रहेंगे।

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